1980 के बाद भारत पर फिर मंडराया मंदी का खतरा, कई बड़े निवेशकों ने निवेश करने से किया इंकार

कोरोना काल में भारत पर मंदी का खतरा और अधिक गहराता जा रहा है। दरअसल बीते चार दशकों से मंदी की मार झेल रही भारतीय कंपनियों पर एक बार फिर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।  चार दशकों से संकुचन की ओर बढ़ रही अर्थव्यवस्था को एक और तेज झटका देते हुए कई बड़े निवेशकों ने अब भारत में पैसा लगाने से इंकार कर दिया है।

भारत में सिमट रहे निवेशक

गौरतलब है कि अरबपति कुमार मंगलम बिड़ला की हिंडाल्को इंडस्ट्रीज लिमिटेड की योजना है कि पूंजीगत खर्च में 40% तक की कटौती की जा सकती है, क्योंकि कंपनी की योजना नकदी को संरक्षित करने की है, जबकि भारत की सबसे बड़ी इस्पात निर्माता कंपनी टाटा स्टील लिमिटेड को पिछले साल के स्तर के मुकाबले इस साल इस तरह के खर्च में लगभग आधी गिरावट आएगी।

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1980 के बाद सबसे बड़ा सकंट

दरअसल आर्थिक मंदी के चलते अब वे सीमेंट और ऑटोमेकर्स द्वारा एक योजना में खर्च करने की योजना को स्थगित करने में शामिल हो गए हैं। उनका मानना है कि इस समय एशिया की तीसरी सबसे बड़ी फर्म आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रही है, जिसके चलते इस साल अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में 4.5% की कमी आ सकती है। बता दे ये साल 1980 के बाद आया पहला ऐसा दौर है, जब आर्थिक व्यवस्था इतनी मंदी के दौर से गुजर रही है।

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भारत की आर्थिक नगरी कहलाने वाली मुबई पर भी इसकी गहरी मार पड़ रही है। पूंजी निवेश के साथ-साथ दोनों निजी और सार्वजनिक – सकल घरेलू उत्पाद का लगभग एक चौथाई हिस्सा खर्च में निवेश हो रहा है। वहीं स्वास्थ्य मामलों में बढ़ते खर्च के चलते अब कारोबार में कम खर्च लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था पर भार कर सकता है, जिसमें इसकी संभावित विकास दर 7% -8% शामिल है।

कोरोनाबंदी के कारण जहां एक तरफ कंपनियों का कारोबार सीमित कर्माचारियों के चलते सिमटता जा रहा है, तो वहीं बाहरी कंपनियां ऐसे हालातों में भारत में निवेश करने से कतरा रही है। कोरोना के चलते जारी लॉकडाउन से  हाल की कमाई ने कंपनियों पर सुस्त लाभ दिखाया है, क्योंकि कोविड-19 महामारी की खपत, अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी को रोकने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग ही एकमात्र उपाय है।

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